शनिवार, 4 अप्रैल 2009

अंदाज़ आज का...!


जिन्हें शक हो वो करें और ख़ुदाओं की तलाश

हम तो इंसान को दुनिया का ख़ुदा कहते हैं

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फ़िराक़ गोरखपुरी

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2009

अंदाज़े बयां...हर दिन नया.


न हुआ, पर न हुआ 'मीर' का अंदाज़ नसीब
'ज़ौक़' यारों ने बहुत ज़ोर ग़ज़ल में मारा
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तूती-ए-हिंद मीर तकी 'मीर'

गुरुवार, 2 अप्रैल 2009

अंदाज़े बयां...हर दिन नया.


ढूढता फिरता हूँ ऐ 'इक़बाल' अपने आप को
आप ही गोया मुसाफिर आप ही मंज़िल हूँ मैं
******************* अल्लामा इक़बाल.

गुरुवार, 26 मार्च 2009

ख़्वाब मरते नहीं.


ख़्वाब मरते नहीं
ख़्वाब दिल हैं,न आँखें, न साँसें जो
रेज़ा-रेज़ा हुए बिखर जायेंगे
ख़्वाब मरते नहीं
ख़्वाब तो रौशनी हैं, नवा हैं, हवा हैं
जो काले पहाड़ों से रुकते नहीं
ज़ुल्म के दोखजों से भी फुंकते नहीं
रौशनी और नवा और हवा के अलम
मकतलों में पहुँचकर भी झुकते नहीं
ख़्वाब जो हर्फ़ हैं
ख़्वाब जो नूर हैं
ख़्वाब सुकरात हैं
ख़्वाब मंसूर हैं।
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अहमद फ़राज़ साहब की रचना
'संस्कृति-कल,आज और कल' से साभार

मंगलवार, 17 मार्च 2009

रोटियों तक ले चलो...पसंदीदा ग़ज़ल.


बंद कमरे में चटकती चूडियों तक ले चलो
बिक रही है जो तुम उसकी सिसकियों तक ले चलो

जिसके तन का लहू पीकर ये शहर रौशन हुआ
मेहनतकशों की उन अँधेरी बस्तियों तक ले चलो

मुद्दतों गुजरी है मुझको एक पल न सो सका
नींद आ जायेगी माँ की थपकियों तक ले चलो

शेर सुन कर उन गरीबों को मिलेगा क्या भला
हाथ उनका थामकर तुम रोटियों तक ले चलो
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मुकेश त्रिपाठी 'दीपक' की ग़ज़ल साभार.

मंगलवार, 3 मार्च 2009

मेरी पसंद...निदा फाज़ली

मित्रों निदा साहब के ये दोहे दिल में बस गए.
लीजिए आप भी पढ़िए....
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जीवन भर भटका किए, खुली न मन की गाँठ
उसका रास्ता छोड़कर, देखी उसकी बाट

सातों दिन भगवान के, क्या मंगल क्या पीर
जिस दिन सोए देर तक, भूखा रहे फकीर

मुझ जैसा एक आदमी, मेरा ही हमनाम
उल्टा-सीधा वो चले, मुझे करे बदनाम

सीधा-सादा डाकिया, जादू करे महान
एक-ही थैले में भरे, आँसू और मुस्कान

पंछी मानव, फूल,जल, अलग-अलग आकार
माटी का घर एक ही, सारे रिश्तेदार

मैं भी तू भी यात्री, आती-जाती रेल
अपने-अपने गाँव तक, सबका सब से मेल
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शनिवार, 4 अक्टूबर 2008

चन्द्रसेन विराट के मुक्तक.

मित्रों !
श्री चंद्रसेन विराट मानव मन की उलझन को
स्पष्ट दृष्टि से शब्द देने वाले और विसंगत
दृश्य चित्रों को पूरी संगति के साथ उकेरने वाले
मेरे प्रिय सृजन-शिल्पी हैं। आज नई दुनिया के
तरंग (५ अक्टूबर २००८ ) में उनकी
सद्यः प्रकाशित कृति
'कुछ अंगारे कुछ फुहारें' की
डॉ.कृष्णगोपाल मिश्र द्वारा लिखित समीक्षा पढ़ी।
उसमें कुछ मुक्तक मन को छू गए
आप भी पढ़ लीजिए।
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जो दिखाए थे, ख़्वाब दो हमको
मौन क्यों हो,ज़वाब दो हमको
हम हैं जनता की मांगते हैं तुमसे
पिछला सारा हिसाब दो हमको

ये है वैश्वीकरण की पुरवाई
ये उदारीकरण की उबकाई
आप नाहक ही आँख ढपते हैं
ये खुलापन ? ये सभी नंगाई

प्रेम,उत्सर्ग किया करता है
वर्ग,अपवर्ग किया करता है
प्रेम ही नर को बना नारायण
भूमि को स्वर्ग किया करता है
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