शनिवार, 20 सितंबर 2008

विनोद कुमार शुक्ल / मुझे बचाना है.

श्री विनोद कुमार शुक्ल की
एक और कविता
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मुझे बचाना है
एक एक कर
अपनी प्यारी दुनिया को
बुरे लोगों की नज़र से
इसे ख़त्म कर देने को।

सबसे पहले
घर के सामने से
नीम की शाखा तोड़
मैंने मारा नीम को
भाग यहाँ से पेड़
दूर भाग जा।
घर को पीटा
दीवालों दरवाजों को
उसी नीम की शाखा से
भाग !भाग ! यहाँ से घर।

कोई मुझे करे बेदख़ल
मेरे घर मेरी दुनिया से
फिर अपने को बचाने
जाने कितना समय लगे
भाग यहाँ से घर।
भाग ! भाग ! मेरी दुनिया सबकी दुनिया
बहुत दूर किसी और ज़गह
बची रह जाकर।

मैं यहीं रहूँगा
लड़ता भिड़ता
मैं जनता हूँ
कोई दूसरा लोक नहीं
नहीं परलोक
मरकर या
बचकर मैं अपनी ही दुनिया में जाऊँगा
जो करती होगी इंतज़ार मेरे बचने का।
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3 टिप्‍पणियां:

Gyandutt Pandey ने कहा…

सच है - सब यहीं है। कर्मभूमि यहीं है।

अभिषेक ओझा ने कहा…

आभार इस रचना के लिए.

ravikant ने कहा…

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