मंगलवार, 16 सितंबर 2008
विनोदकुमार शुक्ल / जो मेरे घर कभी नहीं आयेंगे
श्री विनोदकुमार शुक्ल का जन्म १ जनवरी १९३७ को राजनांदगांव (छत्तीसगढ़) में हुआ। उनका पहला कविता संग्रह 'लगभग जयहिंद' १९७१ में प्रकाशित हुआ था। दूसरा 'वह आदमी चला गया गरम कोट पहिनकर विचार की तरह' १९८१ में तथा उनका पहला उपन्यास 'नौकर की कमीज़' १९७९ में छपा। १९८८ में कहानी संग्रह 'पेड़ का कमरा' और १९९२ में कविता संग्रह 'सब कुछ होना बचा रहेगा' प्रकाशित हुआ। उनकी रचनाओं का अनेक भाषाओं में अनुवाद भी हुआ है। १९९४ से १९९६ तक निराला सृजन पीठ भोपाल में अतिथि साहित्यकार रहते हुए श्री शुक्ल ने 'खिलेगा तो देखेंगे',
'दीवार में एक खिड़की रहती थी' उपन्यास पूर्ण किया।
यहाँ प्रस्तुत है उनकी एक कविता -
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जो मेरे घर कभी नहीं आयेंगे
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जो मेरे घर कभी नहीं आयेंगे
मैं उनसे मिलने
उनके पास चला जाऊँगा
एक उफनती नदी कभी
नहीं आयेगी मेरे घर
नदी जैसे लोगों से मिलने
नदी किनारे जाऊँगा
कुछ तैरूंगा और डूब जाऊँगा.
पहाड़, टीले, चट्टानें, तालाब
असंख्य पेड़, खेत
कभी नहीं आयेंगे मेरे घर
खेत खलिहानों जैसे लोगों से मिलने
गाँव-गाँव, जंगल-गलियाँ जाऊँगा.
जो लगातार काम में लगे हैं
मैं फुर्सत से नहीं
उनसे एक ज़रूरी काम की तरह
मिलता रहूँगा...
इसे मैं अकेली आख़िरी इच्छा की तरह
सबसे पहली इच्छा रखना चाहूँगा.
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'दीवार में एक खिड़की रहती थी' उपन्यास पूर्ण किया।
यहाँ प्रस्तुत है उनकी एक कविता -
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जो मेरे घर कभी नहीं आयेंगे
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जो मेरे घर कभी नहीं आयेंगे
मैं उनसे मिलने
उनके पास चला जाऊँगा
एक उफनती नदी कभी
नहीं आयेगी मेरे घर
नदी जैसे लोगों से मिलने
नदी किनारे जाऊँगा
कुछ तैरूंगा और डूब जाऊँगा.
पहाड़, टीले, चट्टानें, तालाब
असंख्य पेड़, खेत
कभी नहीं आयेंगे मेरे घर
खेत खलिहानों जैसे लोगों से मिलने
गाँव-गाँव, जंगल-गलियाँ जाऊँगा.
जो लगातार काम में लगे हैं
मैं फुर्सत से नहीं
उनसे एक ज़रूरी काम की तरह
मिलता रहूँगा...
इसे मैं अकेली आख़िरी इच्छा की तरह
सबसे पहली इच्छा रखना चाहूँगा.
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शुक्रवार, 8 अगस्त 2008
जो पै तुलसी न गावतो.
भारत ह्रदय ...भारती कंठ गोसाईं तुलसीदास जी के प्रति
बेनी कवि का उदगार मन को छू गया
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बेदमत सोधि,सोधि-सोधि कै पुरान सबै
संत और असंतन को भेद को बतावतो।
कपटी कुराही क्रूर कलि के कुचाली जीव
कौन राम नामहु की चर्चा चालवतो।।
बेनी कबि कहै मानो-मानो यह प्रतीति यह
पाहन-हिए मैं कौन प्रेम उपजावतो।
भारी भवसागर उतारतो कवन पार
जो पै यह रामायण तुलसी न गावतो।।
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बेनी कवि का उदगार मन को छू गया
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बेदमत सोधि,सोधि-सोधि कै पुरान सबै
संत और असंतन को भेद को बतावतो।
कपटी कुराही क्रूर कलि के कुचाली जीव
कौन राम नामहु की चर्चा चालवतो।।
बेनी कबि कहै मानो-मानो यह प्रतीति यह
पाहन-हिए मैं कौन प्रेम उपजावतो।
भारी भवसागर उतारतो कवन पार
जो पै यह रामायण तुलसी न गावतो।।
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गुरुवार, 7 अगस्त 2008
कविता लसी पा तुलसी की कला.
=========================================कवि कुल किरीट गोस्वामी तुलसीदास जी की जयन्ती पर
उनके दिव्य योगदान को नमन करते हुए स्मरण स्वरूप ही
यहाँ उनकी प्रमुख कृतियों का सारभूत परिचय प्रस्तुत है.
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१ रामलला नहछू
बारात के पहले लग्न मंडप में माँ, वर को नहला धुलाकर
गोद में लेकर बैठती है और नाइन पैर के नखों को महावर
के रंग से रंगती है, इस रीत को नहछू कहते हैं। सोहर छंद में
लिखी गई इस रचना की भाषा पूर्वी अवधी है।
२ वैराग्य-संदीपनी
दोहों में लिखी गई इस रचना में सदाचार, सत्संग, वैराग्य
इत्यादि के माध्यम से भक्ति का मार्ग बताया गया है।भाषा
अवधी है।
३ बरवै रामायण
सात कांडों में विभाजित यह रचना राम कथा से संबंधित है।
बरवै छंद मुक्तक रूप में प्रयुक्त है। भाषा अवधी है।
४ पार्वती-मंगल
जगदम्बा पार्वती की तपस्या, शिव-पार्वती विवाह,बारात,विदाई
इत्यादि प्रसंगों का सुंदर वर्णन। मंगल और हरि गीतिका छंदों
का प्रयोग किया गया है। कथा, कुमार सम्भव पर आधारित है।
भाषा पूरबी अवधी है।
५ जानकी-मंगल
जानकी जी के विवाह का वर्णन है। स्वयंवर प्रसंग से अयोध्या
में आनंदोत्सव तक विस्तृत है। वाल्मीकि रामायण का प्रभाव।
इसकी भाषा भी अवधी है।
६ रामाज्ञा-प्रश्न
इसमें सात सर्ग हैं। प्रत्येक सर्ग में सात सप्तक हैं। प्रत्येक सप्तक
में सात दोहे हैं। प्रारंभ में शकुन -विचार विधि का उल्लेख है।
भाषा अवधी है।
७ दोहावली
शुद्ध मुक्तक रचना। समाज,धर्म,व्यक्ति,भक्ति,राजनीति,ज्योतिष,
आचार-व्यवहार,राज्य-आदर्श इत्यादि विषयों पर दोहे रचे गए हैं।
भाषा अवधी है।
८ कवितावली
इसमें कवित्त,घनाक्षरी,छप्पय,सवैया आदि छंदों का समावेश है।
सात कांड है। ब्रज भाषा है।
९ हनुमान बाहुक
कवितावली का एक अंश। बाहु पीड़ा और अन्य पीड़ाओं का
निवेदन हनुमान जी तथा अन्य देवताओं से किया गया है। भाषा
अवधी है।
१० कृष्ण-गीतावली
श्री कृष्ण के जीवन से संबंधित पद हैं। भाषा ब्रज है।
११ विनय-पत्रिका
राग-रागिनियों पर आधारित गीति काव्य है। भाषा ब्रज है।
१२ रामचरितमानस
सात कांडों में विभक्त है। दोहे,चौपाई,सोरठा तथा विभिन्न
मात्रिक एवं वार्णिक छंदों का उपयोग किया गया है। भाषा
भाषा पूर्वी-पंचोही अवधी.
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मंगलवार, 5 अगस्त 2008
पत्रकार का दायित्व / डा.शंकर दयाल शर्मा
एक सच्चे पत्रकार का काम केवल घटनाओं का हू-ब-हू ज़िक्र भर कर देना नहीं है, बल्कि उस घटना को इस रूप में विश्लेषित करना भी है, जिससे समाज में उच्च मानवीय गुणों का विकास हो सके। यहीं पर अच्छे को प्रोत्साहित करने तथा बुरे को निरुत्साहित करने की बात आती है। आप स्वयं को महज़ एक दर्शक की भूमिका तक सीमित नहीं रख सकते। आप समाज के एक महत्वपूर्ण अंग हैं। इस नाते आप पर एक महत्वपूर्ण दायित्व भी है। यह दायित्व है- लोगों की चेतना को समाज के हित में जाग्रत करना। बापू ने पत्रकार के कार्य की चर्चा करते हुए कहा था, "पत्रकारिता का सही कार्य लोक चेतना को शिक्षित करना है, न कि उसे वांछित-अवांछित प्रभावों से भर देना। इसलिए पत्रकारों को स्वविवेक का उपयोग करना पड़ता है कि वे क्या रिपोर्ट करें और कब रिपोर्ट करें। इस प्रकार पत्रकार केवल सत्य तक सीमित नहीं रह सकता। पत्रकारिता 'घटनाओं का बुद्धिमत्तापूर्ण पूर्वानुमान' करने की कला बन गई है।" मेरी समझ में यहाँ जो 'बुद्धिमत्तापूर्ण' शब्द का प्रयोग किया गया है, इसका आधार यही है कि कौन-सी बात समाज के हित में है, और कौन-सी बात समाज के लिए अहितकर है। मैं इसे किसी भी बात को कसने की सर्वोत्तम कसौटी मानता हूँ। यही कसौटी पत्रकारिता पर भी लागू होती है. ================================================='चेतना के स्रोत' से साभार
शनिवार, 2 अगस्त 2008
महान हिन्दी सेवी की विरक्ति-भावना / शिवकुमार गोयल

पंडित माखनलाल चतुर्वेदी एक राष्ट्रवादी पत्रकार के साथ-साथ
महान ओजस्वी कवि भी थे। उनकी लिखी कविताओं ने
राष्ट्रीय जागरण अभियान में जान फूँकने में अहम
भूमिका निभाई थी। वे स्वयं स्वाधीनता आन्दोलन में
सक्रिय रहे। सन 1921 में उन्हें राजद्रोह के आरोप में
गिरफ्तार किया गया था।
'एक भारतीय आत्मा' के नाम से रचित उनकी कविताओं
से अनेक राष्ट्रीय नेताओं ने प्रेरणा ली थी। उनकी कविता
'पुष्प की अभिलाषा' की पंक्तियाँ तो देश की युवा पीढ़ी को
प्रेरित करने की अनूठी क्षमता रखती थी।
देश के स्वाधीन होने के बाद राष्ट्रपति डा.राजेन्द्र प्रसाद की
इच्छा थी कि वे मैथिलीशरण गुप्त तथा पंडित बनारसीदास
चतुर्वेदी के साथ-साथ पंडित माखनलाल चतुर्वेदी जी को भी
राज्य सभा का सदस्य मनोनीत करें।
एक दिन खंडवा के कलेक्टर को संदेश पहुँचा कि वे
माखनलाल जी से भेंट कर राज्य सभा की सदस्यता की
स्वीकृति प्राप्त करें। कलेक्टर दादा के निवास-sthan पर पहुँचे
तथा राष्ट्रपति के संदेश से उन्हें अवगत कराया। दादा मुस्कराए और
विनम्रता से बोले ' कलेक्टर साहब, मैंने कभी 'पुष्प की अभिलाषा'
लिखी थी - 'चाह नहीं मैं सुर बाला के गहनों में गूँथा जाऊँ'। उससे आगे
लिखा था, 'माली, मुझे (पुष्प को) तोड़कर उस रास्ते पर फेंक देना
जिससे राष्ट्र वीर गुजरें तथा उनके चरणों का स्पर्श पा सकें।'
'मैं आज भी उसी पुष्प की तरह, राज मुकुट से दूर रहना चाहता हूँ।
मैं किसी भी राजकीय पद की स्वीकृति नहीं दे सकता।
कलेक्टर, वयोवृद्ध सरस्वती साधक की सांसद जैसे पद के प्रति
विरक्ति की भावना को देखकर चकित रह गए।
============================================
'साहित्य अमृत' जुलाई २००७ से साभार
महान ओजस्वी कवि भी थे। उनकी लिखी कविताओं ने
राष्ट्रीय जागरण अभियान में जान फूँकने में अहम
भूमिका निभाई थी। वे स्वयं स्वाधीनता आन्दोलन में
सक्रिय रहे। सन 1921 में उन्हें राजद्रोह के आरोप में
गिरफ्तार किया गया था।
'एक भारतीय आत्मा' के नाम से रचित उनकी कविताओं
से अनेक राष्ट्रीय नेताओं ने प्रेरणा ली थी। उनकी कविता
'पुष्प की अभिलाषा' की पंक्तियाँ तो देश की युवा पीढ़ी को
प्रेरित करने की अनूठी क्षमता रखती थी।
देश के स्वाधीन होने के बाद राष्ट्रपति डा.राजेन्द्र प्रसाद की
इच्छा थी कि वे मैथिलीशरण गुप्त तथा पंडित बनारसीदास
चतुर्वेदी के साथ-साथ पंडित माखनलाल चतुर्वेदी जी को भी
राज्य सभा का सदस्य मनोनीत करें।
एक दिन खंडवा के कलेक्टर को संदेश पहुँचा कि वे
माखनलाल जी से भेंट कर राज्य सभा की सदस्यता की
स्वीकृति प्राप्त करें। कलेक्टर दादा के निवास-sthan पर पहुँचे
तथा राष्ट्रपति के संदेश से उन्हें अवगत कराया। दादा मुस्कराए और
विनम्रता से बोले ' कलेक्टर साहब, मैंने कभी 'पुष्प की अभिलाषा'
लिखी थी - 'चाह नहीं मैं सुर बाला के गहनों में गूँथा जाऊँ'। उससे आगे
लिखा था, 'माली, मुझे (पुष्प को) तोड़कर उस रास्ते पर फेंक देना
जिससे राष्ट्र वीर गुजरें तथा उनके चरणों का स्पर्श पा सकें।'
'मैं आज भी उसी पुष्प की तरह, राज मुकुट से दूर रहना चाहता हूँ।
मैं किसी भी राजकीय पद की स्वीकृति नहीं दे सकता।
कलेक्टर, वयोवृद्ध सरस्वती साधक की सांसद जैसे पद के प्रति
विरक्ति की भावना को देखकर चकित रह गए।
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'साहित्य अमृत' जुलाई २००७ से साभार
सोमवार, 28 जुलाई 2008
सुभाषित / एम.टी.वासुदेवन नायर
साहित्य साक्षी होता है मानवीय दुर्गति का,न्यायिक निषेध का। वह समस्त निष्ठुरताओं का गवाह तो है पर उसके पास कोई तैयार निदान या समाधान नहीं है। एक राजनीतिज्ञ कह सकता है - 'तुम मुझे वोट दो, मैं देश को स्वर्ग बना दूँगा।' एक धार्मिक व्यक्ति कह सकता है - 'मेरी राह चलो, निश्चित स्वर्ग मिलेगा।' परन्तु एक लेखक नहीं कह सकता की मेरी रचना पढो, तुम दूसरे ज़हां में पहुँच जाओगे या कि मैं सब कुछ ठीक कर दूँगा। इस विषय में लेखक कुछ भी नहीं कर सकता। वह तो मानवीय यातना की विस्तीर्ण धरती का एक मूक साक्षी है। वह तो केवल अपनी चिंताएँ बाँट सकता है, चेतना जगा सकता है कि देखो यह चीजें हैं जो व्यवस्था को खोखला कर रही हैं, इनसे सावधान रहो।
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वागर्थ : अंक ४९ से साभार.
रविवार, 20 जुलाई 2008
लोक संस्कृति / महावीर अग्रवाल
वर्तमान में विकसित किसी भी देश की संस्कृति का
मूल उद्गम वहाँ का लोक जीवन ही है, क्योंकि
लोक संस्कृति ही तो मानव की सामूहिक ऊर्जा का स्रोत होती है।
लोक जीवन का रस ही समाज की जड़ों को सींचता है।
आज का मनुष्य जिस तरह की मनुष्यता की खोज कर रहा है
उसे लोक संस्कृति के विकास में ही उपलब्ध किया जा सकता है।
यह लोक संस्कृति तो लोक परम्पराओं में, लोक साहित्य, लोक नाट्य,
लोक कला, लोक गीत में सहज आत्मीयता के साथ उल्लसित है।
लोक जीवन में कटुता, द्वेष, घृणा की जगह प्रेम, सेवा, सहृदयता और
हार्दिकता मिलती है। जन कल्याण की भावना से आपूरित लोक संस्कृति
ने हमेशा लोक धर्म के माध्यम से ही अनुभूति और यथार्थ की
अभिव्यक्ति की है। उसके जीवन मूल्य हमारी धरोहर हैं।
लोक संस्कृति की यह जो शक्ति है,
यह उसी विज्ञान सम्मत धारणा के कारण है।
लोक संस्कृति जन-जन के श्रम से सिंचित होकर प्रकृति की गोद में
पलती-पनपती रही है। मानव का मानव के प्रति सहज प्रेम ही
लोक संस्कृति का साध्य रहा है। श्रम की पूजा के साथ ही
पारस्परिक प्रेम से भरी विश्व बंधुत्व की भावना हमारे लोक जीवन का
मूल आधार रही है। जन जीवन के बीच
कलाओं में लोक जीवन आज भी स्पन्दित है। लोक कला को संरक्षण और
प्रोत्साहन देने के नाम पर ढोल पीटने में लगे हुए शोषक वर्ग का नज़रिया
अभिजात समूह के मनोरंजन तक सीमित रह जाता है। जबकि आवश्यकता
लोक-कला और लोक संस्कृति के माध्यम से जनता को बदलने, उसे चैतन्य करने,
उसे परिष्कृत करने की है। जिनकी बिना पर ही ये समाज टिका है।
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लोक संस्कृति आयाम और परिप्रेक्ष्य / श्री प्रकाशन दुर्ग से
मूल उद्गम वहाँ का लोक जीवन ही है, क्योंकि
लोक संस्कृति ही तो मानव की सामूहिक ऊर्जा का स्रोत होती है।
लोक जीवन का रस ही समाज की जड़ों को सींचता है।
आज का मनुष्य जिस तरह की मनुष्यता की खोज कर रहा है
उसे लोक संस्कृति के विकास में ही उपलब्ध किया जा सकता है।
यह लोक संस्कृति तो लोक परम्पराओं में, लोक साहित्य, लोक नाट्य,
लोक कला, लोक गीत में सहज आत्मीयता के साथ उल्लसित है।
लोक जीवन में कटुता, द्वेष, घृणा की जगह प्रेम, सेवा, सहृदयता और
हार्दिकता मिलती है। जन कल्याण की भावना से आपूरित लोक संस्कृति
ने हमेशा लोक धर्म के माध्यम से ही अनुभूति और यथार्थ की
अभिव्यक्ति की है। उसके जीवन मूल्य हमारी धरोहर हैं।
लोक संस्कृति की यह जो शक्ति है,
यह उसी विज्ञान सम्मत धारणा के कारण है।
लोक संस्कृति जन-जन के श्रम से सिंचित होकर प्रकृति की गोद में
पलती-पनपती रही है। मानव का मानव के प्रति सहज प्रेम ही
लोक संस्कृति का साध्य रहा है। श्रम की पूजा के साथ ही
पारस्परिक प्रेम से भरी विश्व बंधुत्व की भावना हमारे लोक जीवन का
मूल आधार रही है। जन जीवन के बीच
कलाओं में लोक जीवन आज भी स्पन्दित है। लोक कला को संरक्षण और
प्रोत्साहन देने के नाम पर ढोल पीटने में लगे हुए शोषक वर्ग का नज़रिया
अभिजात समूह के मनोरंजन तक सीमित रह जाता है। जबकि आवश्यकता
लोक-कला और लोक संस्कृति के माध्यम से जनता को बदलने, उसे चैतन्य करने,
उसे परिष्कृत करने की है। जिनकी बिना पर ही ये समाज टिका है।
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लोक संस्कृति आयाम और परिप्रेक्ष्य / श्री प्रकाशन दुर्ग से
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