शुक्रवार, 3 अप्रैल 2009

अंदाज़े बयां...हर दिन नया.


न हुआ, पर न हुआ 'मीर' का अंदाज़ नसीब
'ज़ौक़' यारों ने बहुत ज़ोर ग़ज़ल में मारा
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तूती-ए-हिंद मीर तकी 'मीर'

3 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

फिराक गोरखपुरी का डाक-टिकट अच्छा लगा।
भाई चन्द्र कुमार जैन बधाई स्वीकार करें।

Dr. Chandra Kumar Jain ने कहा…

आदरणीय डाक्टर साहब,
त्रुटि वश फोटो फिराक़ साहब का
लग गया था.....आभार आपका.
दरअसल उनका नाम मीर के अग्रणी
अनुवादकों में शुमार है.
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डॉ.चन्द्रकुमार जैन

Dr. Amar Jyoti ने कहा…

क्या बात है!
रेख्ती के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो ग़ालिब
कहते है अगले ज़माने में कोई मीर भी था